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बुधवार, 15 मई 2019

मई 15, 2019

क्या हम एलियंस है ? भाग-2, विषय- नर और मादा शारीरिक संरचना

                                                             धरतीपर रहने वाले अगल-अलग जीवोंको सहवास के लिए, अपने साथी को आकर्षित करने के लिए कुदरत ने कुछ खूबियोसे नवाजा है। जैसे मादा मोरनी को आकर्षित करने के लिए नर मोर को रंगीन पंख दिए है। मादा शेरनी को आकर्षित करने के लिए नर शेर की गर्दन पर बालो का घेराव है। कुदरत ने हर जानवर को ऐसी खाशियाते दी है। इंसानो को भी ये खाशियाते मिली है। धरतीके सभी जीवो में ये खाशियाते नर को दी गयी है ताकि वोह मादा को आकर्षित कर सके, लेकिन इंसानो के मामलेमे ये नियम उलटा पड़ गया है। इंसानोमे में मादा को ये खाशियाते मिली है नर को आकर्षित करने  लिए। आखिर इंसानोंके मामलेमे ये बाजी उलटी कैसे हो गई ? ये बोहोत बड़ा रहष्य है। बाकि जनवरोकि तुलना में इंसानी नर और मादा इन दोनों की शारीरिक रचना में  बोहोत ज्यादा अंतर है। दोनों के शरीर का आकार, शरीर के ऊपर बालो का प्रमाण, चलनेका तरीका, आवाज ऐसी बोहोत सी बातो में अंतर है। दूसरे जानवरो की तुलना में ये अंतर कुछ ज्यादा ही है। बाकीके जानवरो की बात तो बोहोत दूर जिन्हे हम अपना रिश्तेदार कहते है उन वानर परिवार में भी ये विशेषताएं पायी नहीं जाती। इंसानो में पुरुषोंको दाढ़ी आती है लेकिन औरतो को दाढ़ी नहीं आती। लेकिन जिस वानर परिवार के हम सदस्य कहलाते है उनके नर और मादा के चहरे में ये विशेष अंतर देखने को नहीं मिलता। अब इसे क्या चमत्कार कहेंगे क्या ? और कितने दिन हम ये दावा करेंगे की वनरोसे ही हमारा विकास हुवा है।
                                                                 इंसानो में ये शारीरिक बदलाव बाहर से तो है ही साथ में अंदर से भी है। शारीरिक सामर्थ पुरुषो का  स्त्री यो के मुकाबले ज्यादा है। दोनों के दिमाग के आकार में भी अंतर है। ऐसे में मन में ये भावना उठती ही है की इंसानो का कोई 'निर्माता' जरूर होना चाहिए। विकास एक प्रक्रिया है जिसके कुछ नियम है। लेकिन इन नियमो में इंसान क्यों नहीं बैठता ? लगभग सोला करोड़ साल धरतीपर राज करके भी डायनोसॉर्स बुद्धिमान जीव नहीं बन पाए। लेकिन पिछले पांच लाख सालो विकशित हुवा मानव आज मंगल ग्रह पर अपने यान भेज रहा है। जैसे इंसानोंके विकास को किसीने जान बूझकर गति दी हो। इंसानो का विकास धरतीके बाकि जानवरो के मुकाबले कुछ ज्यादा ही तेजीसे हुवा है। आखिर विकास की ये रफ़्तार सिर्फ इंसानो में ही क्युँ है ? बाकीके जीवो में क्युँ नहीं ? इंसानोंके विकास की ये रफ़्तार आज भी जारी है। 

मंगलवार, 14 मई 2019

मई 14, 2019

क्या हम एलियंस है ? भाग-1, विषय- सिर के बाल

                                                                      क्या सच में हम इस ग्रह के मूल निवाशी है ? या कही ऐसा तो नहीं की हमारी उत्पत्ती किसी और ग्रह पर हुई हो और बादमे जान बूझकर हमे इस ग्रह पर पनपने के लिए छोड़ दिया गया ? आप को शायद ये सवाल अजीब लग रहे होंगे। क्युँ की बचपन से हमे स्कूल में यही सिखाया जा रहा है की हमारी उत्पत्ती वानरों से हुई है। लेकिन क्या सच में ऐसा ही हुवा था ? हम कई सालो से डार्विन के इस सिद्धांत पर आँख मूंदकर भरोसा कर रहे है, लेकिन वोह शत-प्रतिशत खरा है इसका कोई प्रमाण दे सकता है क्या ? डार्विन का ये सिद्धांत धरतीपर रहने वाले बाकि जीवों पर भलेही पूर्णतः लागु होता हो लेकिन इंसानो के ऊपर इस सिद्धांत को लागु करने पर कुछ सवाल खड़े होते है। जिनका कोई जवाब सिद्धांतकारियो के पास नहीं है। ये सवाल है इंसान की शारीरिक संरचना के बारे में, जो धरती के किसी भी और जीव से मेल नहीं खाते। इस कारण एक विरोधाभास बन गया है। मै आपको बताने जा रहा हु इंसानी शरीर की वोह विशेषताएं जो धरतीके किसी भी और जिव में पाई नहीं जाती।
1 ) सिर के बाल :-     सारि धरतीपर इंसान ही एकमात्र ऐसा जीव है जिसके सिर के बाल लम्बे होते है। आप सोच रहे होंगे की इसमें कौनसी बड़ी बात है ? जरा सोचिये की धरतीपर रहने वाले सभी जीवों के शरीर के किसी भी हिस्से के विकास के पीछे कोई न कोई वजह है।  लेकिन इंसानोंके लम्बे बालो के पीछे क्या वजह है ये तो खुद वैज्ञानिको भी पता नहीं है। और सबसे अहम बात तो ये है की अगर हमारे पूर्वज वानर थे तो वानर परिवार के बंदर, चिम्पांजी या गोरिला इनमेसे किसी के भी सिर के बाल लम्बे क्युँ नहीं ? सिर्फ इंसानो के ही क्युँ है ? खास बात तो ये है की सारि पृथ्वीपर इंसान ही एकमात्र जीव है जिसके सिर के बाल लम्बे होते है। डार्विन के सिद्धांत के मुताबिल हमारा विकास वनरोसे हुवा। जैसे-जैसे विकास की प्रक्रिया आगे बढाती गई, इंसानी शरीर में कई बदलाव हुए। पहले हमारे सारे शरीर पर घने बाल थे, लेकिन बादमे धीरे-धीरे कम होते गए। लेकिन हमारे सिर के बाल ही कम होनेके बजाय बढ़ते क्युँ गए ? इस सवाल से सारे वैज्ञानिक भी हैरान है।  उनके पास भी इसका कोई जवाब नहीं है।
                                                       और एक मजेदार बात ये है की कुछ लोगोके सिर के बाल झड़ ने कारन वोह गँजे होते है,  खाशियत भी सिर्फ इंसानो में ही पाई जाती है। इंसान के रिस्तेदार ( डार्विन के सिद्धांत के अनुसार ) कहे जाने वाले बंदर , चिम्पांजी और गोरिल्ला इन तिनोमे भी ये गुण बिलकुल भी नहीं है। ये बालो का वरदान आखिर इंसानो को मिला कहासे और कैसे ? ये एक रहस्यमयी बात है। एक तरह से ये उत्पत्ति के चरणों में हुवा चमत्कार है। लेकिन इस चमत्कार की वजह का अभी तक पता नहीं चला है। इस से जुड़ा एक दावा सामने आया था की इंसानोंके पूर्वज जी ग्रह पर रहते होंगे वहा सूरज की तेज धुप पड़ती होंगी। जिससे बचाव के लिए सर पर लंबे बाल विकसित हो गए होंगे। और उसी ग्रह से ये विशेषता हमारे साथ धरतीपर चली आई होंगी। मेरा तो यह मानना है की ये पुख्ता सबूत है इस बात का की इंसानो के विकास में एलियंस का हस्तक्षेप रहा था।

सोमवार, 13 मई 2019

मई 13, 2019

क्या एलियंस इंसानों के रचयिता है ? भाग-4, विषय-जिज्ञासू मन

                                                        अब सबसे आखरी और अहम विशेषता के बारे में हम बात करेंगे, और वोह है "जिज्ञासू मन"। इसी विशेषता के आधार पर सारी मानव जातिका विकास हुवा है। अब तक हमने जो विशेषताएं देखि जिनमे संगीत, धर्म और श्रद्धा, भाषा और रचनात्मकता ये सारी जिज्ञासू मन की ही संताने है। इंसान के मन में उठाने वाले सवाल और उन सवालों के जवाब खोजने की महत्वाकांक्षा ने ही इंसान के विकास की काया की पलट दी। इसी विशेषता ने हमे धरतीके सभी जनवरों से अलग कर दिया। इंसानो के मन में शुरवात से ही उसके आस-पास घटने वाली घटनाओ के प्रति कौतूहल रहा है। इस कौतूहल से उठने वाले सवाल इंसानो को प्रेरित करते रहे है।
                                                   प्राचीन इतिहास में अगर हम देखे तो शुरवात में आदिमानवो को आग के प्रति कौतूहल था। शुरवात में जब जंगल में आग लगती थी तो हमारे पूर्वज भी बाकी जानवरो की तरह उससे डरकर दूर भागते थे। लेकिन एक बार हुवा यु की एक बार जब जंगल में आग लगी तो उसमे कुछ जानवर बुरी तरह झुलस गए जिनकी आदिमानव शिकार किया करता था। जब आदिमानव आग बुझाने के बाद जंगल में गया तो उसे शिकार के लिए कुछ भी नहीं मिला। आग के कारन जानवर भाग गए थे और बाकि बचे झुलस कर मरे हुए थे। आदिमानव ने मजबूरन उन झुलसे हुए जानवरों को खाने का फैसला किया। और जब उन्होंने उस झुलसे हुए जनवरो के मांस को खाया तो उसे वोह स्वादिष्ट लगा। अब तक जो कच्चा मांस वोह खा रहे थे उससे बेहतर आग में भुना हुवा मांस होता है ये बात इंसान को पता चली। यहि से आदिम इंसानों के मन में आग के प्रति आकर्षण निर्माण हुवा। इसी आकर्षण के कारण इंसानों के पुर्वजोने आग पर काबू पाना सिखा। ये घटना इंसान के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना है।
                                                  अगर इंसानो में जिज्ञासू मन ना होता तो आग के प्रति उसके मन में कौतूहल ही नहीं जागता और बादमे हमारे विकास के आगे के चरण भी पुरे नहीं हो पाते, जिसपर हमारे आज के विकास की नीव खड़ी है। इसी कारण ये हमारे दिमाग की सबसे अहम विशेषता है। लेकिन धरतीपर करोडो सालो के दौरान अनगिनत प्रजातियां विकसित हुई, लेकिन सिर्फ इंसानो के अंदर ही ये विशेषता पूर्ण रूप से विकशित हुई। आखिर ऐसा क्यों ? पता नहीं की कुदरत ने इंसानोपर ही इतनी मेहरबानियाँ क्युँ की ? इस सवाल का किसिसके पास जवाब नहीं है। लेकिन मेरे जैसे कई एलियंस के जानकारों का ये दावा है की ये कुदरत की नहीं बल्कि एलियंस की रेहमत है।   

रविवार, 12 मई 2019

मई 12, 2019

क्या एलियंस इंसानों के रचयिता है ? भाग-3, विषय-रचनात्मकता

                                             इंसानो की विकशित बुद्धिके कारण उसके मन में नई-नई कल्पनाये जन्म लेती  रही है और इन कल्पनाओ को इंसान ने हक़ीक़त में उतरा है।  ये कल्पनाये वास्तुकला, चित्रकला, शिल्पकला, कपड़ो पर की जानेवाली कारीगरी  इन कलाओंके जन्म और विकास का कारण बनी है। रचनात्मकता का ये गुण इंसानोमें शुरवात से ही देखा गया है। आदिमानवो द्वारा गुफाओकी दीवारों पर निकली गए चित्रों से हमे इसके प्रमाण मिलते है। उस समय इंसानोका बौद्धिक विकास अपने पहले चरण में ही था। उस समय तो इंसानोकी कोई भाषा भी नहीं थी। यानि जब हम बोल भी नहीं पते थे लेकिन हम में रचनात्मकता थी। ये सच में हैरान करने वाली बात है। और एक हैरत में डालने वाली बात ये है की आज हजारो साल बिताने के बाद भी सिर्फ इंसानोमे ही ये विशेषता पाई गई है। और किसी भी जिव में इसका विकास आखिर क्यों नहीं हुवा ? दूसरी और इंसानोमे रचनात्मकता का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। वोह आज भी बढ़ रहा है और हर क्षेत्र में बढ़ रहा है।
                                              रचनात्मकता इंसानोको दिमागी तौर पर सुकून देने वाली शक्ति है। इंसान के दिमाग को प्रेरणा देने वाली ऊर्जा है। इंसानोने बड़ी-बड़ी इमरतोंको बनाया, लेकिन उसपर भी वह शांत नहीं बैठा। उसने उन इमरतो कि रचनाओं को और बेहतर बनानेकी कोशिश हमेशा की। इससे और नए संरचनाये बनाई। आज भी हमारा दिमाग शांत नहीं है। वह पुराणी कल्पनाओ में और सुधार करके नई-नई कल्पनाये बना रहा है। इससे और बेहतर इमारते हमे देखने को मिल रही है।  ये बात सिर्फ इमरतोंके निर्माण में ही नहीं लागु होती बल्कि हर क्षेत्र में लागु होती है। इंसान की रचनात्मकता उसे कुछ नया करने के लिए सदा प्रेरित कराती है। हर निर्माण से हमारा दिमाग कुछ सिखाता है। वोह अपनी रचनात्मकता को सुधारता है।
                                                 लेकिन ये विशेषता हमारे अंदर आई कहासे ? क्या ये हमारे विकशित होते दिमाग का नतीजा थी ? या इसके बीज हमारे अंदर किसी और ने बोये ? दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताओं में जो विशालकाय संरचनाएं बनायीं गयी, उनका संबंध हर बार आसमान से आये देवताओ से ही क्यों जोड़ा गया है ? इजिप्त के पिरामिड हो या माया के पिरामिड इन दोनों ही सभ्यताके के इतिहास में इन पिरामिडो का संबंध देवताओंसे जोड़ा गया है। सभी प्राचीन मदिरोंकी रचना भी देवताओ के लिए की गई। यानि एक बात तो यहाँ साफ है की इंसानोमे रचनात्मकता को किसी 'और' शक्तीने प्रेरित किया था। मेरा ये मानना है की हमे रचनात्मक बनाने के पीछे एलियंस का ही हाथ था।  आखिर ये विशेषता धरतीपर सिर्फ हमारे अंदर ही विक्षित क्युँ हुई ? इस बात का किसीके पास जवाब नहीं है।   

शुक्रवार, 10 मई 2019

मई 10, 2019

क्या एलियंस इंसानों के रचयिता है ? भाग-2, विषय-संगीत

                                                         इंसानो का विकास के शुरुवाती दौर से ही संगीत के साथ लगाव रहा है।  संगीत को इंसान ने अपनी जिंदगीका एक हिस्सा बना दिया है। इंसानोने धर्म और ईश्वर से संगीत को जोड़कर अपनी उपासना में भी संगीत को शामिल किया है। विकशित शहरी समाज हो या अविकसित आदिवासी कबीले दोनोंही संगीत को चाहते है। इंसान संगीत का इस्तेमाल खुशी ज़ाहिर करनेका जरिया, ईश्वर भक्ति में लीन होनेका जरिया, एकजुट होकर कोई त्यौहार मनानेका जरिया ऐसी कई बातोमे करता है। इन बातोमे सगीत का अपना अलग ही स्थान है। इंसानो को मिली ये एक अदभुत देन है। इंसानोंको छोड़कर और किसी भी जिव में ना तो संगीत की चाह है या इसका ज्ञान। आखिर इंसानोने ये आनंद की तरंगे कहाँसे खोज निकली ? इस सवाल का कोई ठोस जवाब इतिहास के जानकारों के पास नहीं है। बस सब ने अपनी और से बस कुछ संभावनाएं जताई।  लेकिन संभावनाएं किसी सवाल का जवाब नहीं हो सकती।
                                                संगीत इंसान  दिमाग पर संमोहन जैसा प्रभाव डालता है। ये एक तरह का जादू है। कभी कबार अगर हमारा मूड अच्छा हो और अगर हम कोई दुःखद गाना सुनते है तो हमारा मन भी निराश होने लगता है। तो कभी कबार अगर हम निराश हो और अचानक कोई मनपसंद गाना लग जाये तो मन हलका हो जाता है। कुछ गाने हमे प्रेरणा देते है। इंसानोंके दिल-दिमाग पर होने वाला संगीत का असर सच में जादुई है। लेकिन हमे ये जादू मिला कैसे ? कही संगीत भी उन एलियंस की ही देन तो नहीं जो हमारे अतीत में हमसे मिले थे ? जिन्हे हम ईश्वर के रूप में देखा गया था। दुनिया की हर प्राचीन सभ्यताओं में संगीत के देवता का जिक्र है। क्या ये महज इत्तेफ़ाक़ है ?

बुधवार, 8 मई 2019

मई 08, 2019

"ईश्वर" रचयिता या शैतान ?

                               धरतीपर रहने वाले सभी जीवोमेसे सिर्फ इंसान ही ईश्वर इस संकल्पना से जुड़ा है। इंसान शुरू से ही रहश्य के पीछे भागता रहा है। शुरवात के दिनों में जब मानव आदिम अवस्थासे बाहर आ रहा था तो उसके दिल में आसपास प्रकृतिमे घटने वाली घटनाओ को देखकर उसके मन में सवाल जागते थे की आखिर ये घटनाये क्यों होती है ? इनके घटने का कारण क्या होगा ? जैसे की बरसात में बिजली का चमकना, ये भी इंसान के लिए किसी चमत्कार से काम नहीं था। फिर आगे चलकर इस सवाल पर उसने सोचा की शायद इन प्रकृति को चलने वाली कोई दिव्य शक्ति होगी और इसी शक्ति को उसने 'ईश्वर' का नाम दिया। शुरवात में तो मानव प्रकृति की ही पूजा करते थे। इनमे नदिया, पहाड़ ,पेड़ ये सब थे। अब तक तो सब ठीक चल रहा था। लेकिन आगे चलकर इस बीमारी ने भयानक रूप ले लिया। अब वोह ईश्वर जिसे मानव प्रकृति के रूप में पूजता था उन्हें मूर्ति रूप पूजे जाने लगा। और हद तो तब हुई जब इस ईश्वर ने इंसानो के बिच मानव रूप में जन्म लेकर चमत्कार दिखाए और नए धर्म और निति-नियमो का निर्माण किया। और आज तक उनका कड़ा पालन इंसान करता आया है। मगर सवाल ये खड़ा होता है की ये ईश्वर आया कहा से ?
                              आज दुनिया के 80 फीसदी लोग किसीना-किसी धर्म को मानते है। सबका अपना अलग एक ईश्वर है। अपने अगल धर्म-ग्रंथ है जिन में उनके ईश्वर के उपदेश और नीति-नियम है। सभी दावा करते है की उनका धर्म ही सच्चा है और उनका ईश्वर ही सरे विश्व का निर्माता है। लेकिन कोई एकदूसरे से मेल नहीं खाते। सभी धर्मो के ईश्वर दिखते अलग-अलग है। उनकी भाषाए अलग-अलग है। उन्होंने जो बाते कही या उन्होंने जो नियम बनाये वोह भी अलग-अलग है। अगर सारे विश्व का निर्माता अगर एक ही है तो फिर ये भिन्नताएं क्यूँ ? और अगर सारे विश्व का वोह निर्माता है तो बाकीके प्राणी उसी पूजा क्यों नहीं करते ?
हम जिस हवा में सास ले रहे है, वोह भी उस हवा में सास ले रहे है। हम जो पानी पि रहे है वोह भी वही पानी पि रहे है। कही भी कुदरत ने ऐसा कोई पक्षपात नहीं किया है जो उन्हें दिया वोह हमे न दिया हो। इसपर धार्मिक लोगोका जवाब आता है की हमे 'ईश्वर' ने बुद्धि दी है जो हमे दूसरे जनवरोंसे अलग बनती है। और इसी कारण हमे ईश्वर के अहसानमंद होना चाहिए। मै इस बात को मानता हु की इंसानोको बुद्धि का बहुमूल्य वरदान मिला है। लेकिन क्या इसमें सच में उस ईश्वर की कोई भूमिका रही थी जिन्हे हम आज पूजते है ? या फिर वोह कोई और थे ?
                                 ये मेरा मानना है की हमारे विकास में एलियंस का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये बात तो साफ है की हमे आज जो तरक्की हासिल हुयी है उसमे किसी बाहरी शक्ति ने जरूर सहाय्यता की थी। वरना हम आज भी जंगलो में पेड़ो पर लटक रहे होते। 'एरिक वोन डेनिकन'  दुनिया भर में घुमाकर इस बात के सबूत खोज निकाले है की हमारे अतीत में एलियंस आ चुके है और उन्हेही हम ईश्वर कहते है। दोस्तों मैंने इस लेख के शुरवात में ही आपसे कहा था की जो बाते मनुष्योंको अद्भुत लगाती उनमे मानव चमत्कार देखता और उन्हें ईश्वर से जोड़ता था। जब एलियंस धरतिपर आए होंगे तो उन्हें देखकर इंसान अचंभित हो गए होंगे। उनके हवामे उड़ने वाले यान, उनसे निकलने वाली रोशनियाँ। ये सब मानव की कल्पना के बाहर था। उसने जो देखा उसे चमत्कार ही लगा। और उसने एलियंस को भगवान समझ लिया। दोस्तों शायद आप लोगोको बुरा लगा होगा की मै ये क्या कह रहा हु ?
                                 ऊपर जब मैंने धर्म के लिए 'बीमारी' शब्द का प्रयोग किया तो शायद आपको बुरा लगा हो लेकिन मै इसकी वजह आपके सामने रखने जा रहा हु। दोस्तों एक ब्रिटिश मनो-वैज्ञनिका ने दावा किया था की "ईश्वर" एक बीमारी है जो पीढ़ी-दर पीढ़ी आगे बढ़ती जाती है। उसके इस दावे पर अमरीका के वैज्ञानिको परिक्षण करने की ठानी। दोस्तों आपको तो पता ही है की हमारे दिमाग के कई अलग-अलग हिस्से है और हर हिस्से का अपना एक काम है। वैज्ञानिको फिर उस हिस्से को खोज निकाला जो "धर्म और ईश्वर" से जुड़ा है। एक सामान्य व्यक्ति को प्रयोग के लिए बुलाया गया। उसे एक खुर्ची पर बिठा दिया गया। उसे बेल्ट  सहायता से कसकर बांधा गया। फिर उसके सर पर कोड्स लगाए गए और दिमाग के उस हिस्से में जो "ईश्वर और श्रद्धा" का संचालन करता है ,उसपर इलेक्टो-मैग्नेटिक पल्स छोड़े गए और तब वोह हुवा जिसकी किसीने कल्पना भी नहीं की थी। अच्छा हुवा उसे खुर्सी से बांधा हुवा था। जब  इलेक्टो-मैग्नेटिक पल्स उसके दिमाग में पोहचे तो वोह आदमी अचानक पागलो की तरह चिल्लाने लगा " मेरे सामने जीजस क्राइस्ट प्रकट हो गए है " (क्यों की वह इंसान एक क्रिस्चन था और उसकी जीजस में श्रद्धा थी इसी कारन जीजस, अगर उसकी जगह कोई और धर्म का व्यक्ति होता तो शायद कोई और भगवान प्रकट होते ) दोस्तों मैंने पहले भी अपने एक लेख में कहा था की इंसानोंके DNA के साथ किसी  छेड-छाड की हुयी है।  इसी कारन पूरी धरती पर सिर्फ हम ही इस बीमारी के शिकार हुए है। लेकिन आप सोंचेंगे की आखिर इससे एलियंस का क्या फायदा, या  उन्हें ये सब करके क्या हासिल होगा। चलो मै आपको एक उदहारण देकर समझाता हु। अगर एलियंस को धरतीपर अपना कब्ज़ा करना हो तो उन्हें क्या करना पड़ेगा ? कुछ भी तो नहीं। क्या आप नहीं समझे सोचिये की अगर एलियंस धरतीपर अपनी एडवान्स तकनीक के चलते "जीजस" के रूप में किसी एलियंस को दुनिया के सामने प्रकट करे, जो हवामे उडाता हो, जो किसी सभी किसिस और चीज में बदल देता हो, जो मुर्दो को जिन्दा कर दे तो पृथ्वीपर रहने वाले करोडे ईसाई उसकी शरण में चले जायेंगे। उसे कुछ भी नहीं करना पड़ेगा और साडी मानवता उसकी गुलाम हो जाएगी। अब कुछ बात सबझ आयी ?
                             हमारा ईश्वर को मानना हमारे लिए वरदान नहीं बल्कि हमारे खिलाफ रची एक बड़ी साजिश का नतीजा हो सकता है।

बुधवार, 1 मई 2019

मई 01, 2019

क्या एलियंस इंसानों के रचयिता है ? भाग-1, विषय-भाषा


                               डार्विन का सिद्धांत हमे बताता है की धरतीपर रहले वाले बाकि जीवो की तरह इंसान भी उत्क्रांतिका(Evolution) एक फल है। लेकिन ऐसी कई बाते है जो इंसान को धरतीपर रहले वाले बाकि जीवो से अलग कराती है। ये बाते उत्क्रांति में विकशित हुए दूसरे जीवो से मेल नहीं खाती। उन सभी विशेषताओं के बारे में हम एक-एक करके चर्चा करते है।
1) भाषा :- पृथ्वीपर रहने वाले किसी भी प्रकार की जीवो में संवाद की इतनी प्रभावशाली विशेषता विकशित नहीं हुई, सिवाय इंसानों के। लेकिन इंसानोने न सिर्फ बातचीत के लिए भाषा का उपयोग किया बल्कि इसका इस्तेमाल करके साहित्य की रचना भी की। भाषा का इंसानोंके विकास में सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा। भाषा के कारण ही सभ्यताओं का विकास हुवा।
                                       इसमें दिलचस्प बात ये है की धरतीपर रहने वाले सारे दूसरे जीव एकदूसरेसे संपर्क बनाने के लिए जिन अवाजोका इस्तेमाल करते है या यु कहे की उनकी जो भाषा है वह सभी जगह पर एक ही है। उदहारण के तौर पर किसी कुत्ते को लीजिये अफ्रीका में रहने वाला कोई कुत्ता हो या अमेरिका में, दोनोके भोकने ने  का आवाज और उसका मतलब दोनों जगह के जीवो के लिए एक सामान ही होगा। लेकिन इंसानोंके लिए ये नियम लागु नहीं होता। हर एक प्रान्त की भाषा अलग है, उसे बोलने का तरीका अलग है। शब्दों की रचना बदलते ही भाषा बदल जाती है उसका अर्थ बदल जाता है। और एक बात भाषा के लब्ज और उनका इस्तेमाल भी हमेशा एकजैसा नहीं रहता। हर सौ सालो में भाषा के ढांचे में बड़ा बदलाव होता है। उसे एक नया रूप मिल जाता है। लेकिन जब हम दूसरे जनवरोके बारे में देखते है तो हमे ऐसा कोई बदलाव देखनेको नहीं मिलता। सौ साल पहले कुत्तो के भोकने और आज के भोकने में कोई बदलाव नहीं आया है।  आखिर ऐसा क्यों ? लगभग दस हजार सालो पहले हम ने कुत्तो को पालना शुरू किया। पिछले दस हजार सालो में इंसानो की बौद्धिक क्षमता हैरतंगेज रूपसे बढ़ी है। लेकिन इंसानो के साथ रहकर कुत्तो में ये बदलाव क्यों नहीं हुवा ? बस इतना बदलाव हुवा है की वह अब इंसानो के साथ घुलमिल गए है।
                                    ये एक रहश्य है की धरतीपर रहने वाले सिर्फ इंसानोको ही ये कुदरत की देन मिली है। क्या ये कुदरत के पक्ष्यापात का उदहारण है ? या ये इनसानोको दी हुयी एक देन है जो उसे किसी और ने दी है ? कई प्राचीन ग्रंथो में भाषा को रचयिता की देन कहा गया है। लेखोके मुताबिक उनके देवता भी उसी भाषा का इस्तेमाल करते थी जिन भाषाओंमे प्राचीन ग्रंथो की रचना की गई। आश्चर्य की बात है की जब ईश्वर सारी सृष्टि की रचना की तो उसने संवाद के लिए सिर्फ  इंसानो की ही भाषा का इस्तेमाल किया। बाकि जीवोंका वजुद उसके लिए कोई मायने नहीं रखता था। और इसमें में भी एक और रहश्य है की दुनियाकी लगभग हर सभ्यता में ईश्वर ने उनसे बात की थी। जिस भाषा में ये बाते हुयी उन्ही भाषाओमे उनके ग्रंथो को लिखा गया। लकिन सभीके देवताओ की भाषा अगल अलग क्यों है ? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। हर कोई कहता है की उनका ईश्वर की सारी मानव जातिका रचयिता है। लेकिन उनकी भाषाएँ मेल नहीं खाती, उनकी कहानियाँ मेल नहीं खाती।
                                 मेरा यह मानना है की हमारे भूतकाल में हमारे बिच जो हमारे ईश्वर रहते थे, दरसल वह एलियंस ही थे लेकिन। धरतीपर अलग अलग जगहों पर एलियंस की अलग अलग प्रजातियोने इंसानो के साथ सम्पर्क बनाया था। इसी कारण सबकी भाषाओंमे इतना अंतर है। कई एलियंस द्वारा अपहरणग्रस्त लोगोने दवा किया है की उनके साथ एलियंस ने प्राचीन भाषाओं में बात करने की कोशीश की थी। आखिर एलियंस को ये प्राचीन भाषाएँ किसने सिखाई ? कही ऐसा तो नहीं की उन्होंने ही हमे ये भाषाएँ शिखाई थी ? 
इस लेख की अगले भाग में हम चर्चा करेंगे "धर्म और श्रद्धा " पर .

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